किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोखा है सब मगर फिर भी
हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी
(रहगुज़र = राह, पथ)
तेरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है
उतर गया रग-ए-जाँ में ये नेशतर फिर भी
(रग-ए-जाँ = सबसे बड़ी ख़ून की नस जो दिल में जाती है), (नेशतर = नश्तर = शल्य क्रिया/ चीर-फाड़ करने वाला छोटा चाकू)
-फ़िराक़ गोरखपुरी
इसी ग़ज़ल के कुछ और अश'आर:
कहूँ ये कैसे इधर देख या न देख इधर
कि दर्द दर्द है फिर भी, नज़र नज़र फिर भी
खुशा इशारा-ए-पैहम, ज़हे-सुकूत-ए-नज़र
दराज़ होके फ़साना है मुख़्तसर फिर भी
(खुशा = क्या ख़ूब!, वाह वाह), (इशारा-ए-पैहम = लगातार/ बार-बार का इशारा), (ज़हे-सुकूत-ए-नज़र = क्या ख़ूब उनकी ख़ामोश नज़र), (दराज़ = लम्बा, दीर्घ), (फ़साना = क़िस्सा, कहानी), (मुख़्तसर = छोटा)
झपक रही हैं ज़मान-ओ-मकाँ की भी आँखें
मगर है क़ाफ़िला आमादा-ए-सफ़र फिर भी
(आमादा-ए-सफ़र = यात्रा को तैयार)
शब-ए-फ़िराक़ से आगे है आज मेरी नज़र
कि कट ही जाएगी ये शाम-ए-बेसहर फिर भी
(शब-ए-फ़िराक़ = जुदाई की रात), (शाम-ए-बेसहर = बिना सुबह की शाम, बहुत लम्बी शाम)
पलट रहे हैं ग़रीब-उल्-वतन, पलटना था
वो कूचा रूकश-ए-जन्नत हो, घर है घर फिर भी
(ग़रीब-उल्-वतन = जो घर-बार छोड़कर विदेश में पड़ा हो), (कूचा = गली), (रूकश-ए-जन्नत = स्वर्ग समान)
लिपट गया तेरा दीवाना गरचे मंज़िल से
उड़ी-उड़ी-सी है कुछ ख़ाक-ए-रहगुज़र फिर भी
(गरचे = यद्द्पि), (ख़ाक-ए-रहगुज़र = राह की धूल)
अगरचे बेख़ुदी-ए-इश्क़ को ज़माना हुआ
'फ़िराक़' करती रही काम वो नज़र फिर भी
Kisi ka yoon to hua kaun umr bhar phir bhi
Ye husn-o-ishq to dhokha hai sab magar phir bhi
Hazaar baar zamaana idhar se guzra hai
Nayi nayi si hai kuch teri reh-guzar phir bhi
Teri nigaah se bachne mein umr guzri hai
Utar gaya rag-e-jaan mein ye neshtar phir bhi
-Firaq Gorakhpuri
ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोखा है सब मगर फिर भी
हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी
(रहगुज़र = राह, पथ)
तेरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है
उतर गया रग-ए-जाँ में ये नेशतर फिर भी
(रग-ए-जाँ = सबसे बड़ी ख़ून की नस जो दिल में जाती है), (नेशतर = नश्तर = शल्य क्रिया/ चीर-फाड़ करने वाला छोटा चाकू)
-फ़िराक़ गोरखपुरी
इसी ग़ज़ल के कुछ और अश'आर:
कहूँ ये कैसे इधर देख या न देख इधर
कि दर्द दर्द है फिर भी, नज़र नज़र फिर भी
खुशा इशारा-ए-पैहम, ज़हे-सुकूत-ए-नज़र
दराज़ होके फ़साना है मुख़्तसर फिर भी
(खुशा = क्या ख़ूब!, वाह वाह), (इशारा-ए-पैहम = लगातार/ बार-बार का इशारा), (ज़हे-सुकूत-ए-नज़र = क्या ख़ूब उनकी ख़ामोश नज़र), (दराज़ = लम्बा, दीर्घ), (फ़साना = क़िस्सा, कहानी), (मुख़्तसर = छोटा)
झपक रही हैं ज़मान-ओ-मकाँ की भी आँखें
मगर है क़ाफ़िला आमादा-ए-सफ़र फिर भी
(आमादा-ए-सफ़र = यात्रा को तैयार)
शब-ए-फ़िराक़ से आगे है आज मेरी नज़र
कि कट ही जाएगी ये शाम-ए-बेसहर फिर भी
(शब-ए-फ़िराक़ = जुदाई की रात), (शाम-ए-बेसहर = बिना सुबह की शाम, बहुत लम्बी शाम)
पलट रहे हैं ग़रीब-उल्-वतन, पलटना था
वो कूचा रूकश-ए-जन्नत हो, घर है घर फिर भी
(ग़रीब-उल्-वतन = जो घर-बार छोड़कर विदेश में पड़ा हो), (कूचा = गली), (रूकश-ए-जन्नत = स्वर्ग समान)
लिपट गया तेरा दीवाना गरचे मंज़िल से
उड़ी-उड़ी-सी है कुछ ख़ाक-ए-रहगुज़र फिर भी
(गरचे = यद्द्पि), (ख़ाक-ए-रहगुज़र = राह की धूल)
अगरचे बेख़ुदी-ए-इश्क़ को ज़माना हुआ
'फ़िराक़' करती रही काम वो नज़र फिर भी
Kisi ka yoon to hua kaun umr bhar phir bhi
Ye husn-o-ishq to dhokha hai sab magar phir bhi
Hazaar baar zamaana idhar se guzra hai
Nayi nayi si hai kuch teri reh-guzar phir bhi
Teri nigaah se bachne mein umr guzri hai
Utar gaya rag-e-jaan mein ye neshtar phir bhi
-Firaq Gorakhpuri
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